Sunday, May 10, 2015

है उम्मीद इतनी सी | Hope

है कराहता हुआ
सुनसान अकेला वीरान ये बाज़ार ।
है उम्मीद इतनी सी
कल जुटेगी ज़रूर यहाँ पर भीड़ ॥

है तड़पता हुआ
प्रेमिका से बिछड़ कर कोई प्रेमी ।
है उम्मीद इतनी सी
कल मुलाकात उनसे ज़रूर है होनी ॥

है आहत बहुत
अपनी विफलताओं से ये बालक ।
है उम्मीद इतनी सी
कल सफलता ज़रूर लगाएगी इसे तिलक ॥

है डराता हमें
समेटे चाँद की किरणे रात का ये अँधेरा ।
है उम्मीद इतनी सी
कल रौशन ज़रूर होगा हमारा सवेरा ॥

 - अमर






है लिखी मैंने
बहुत ही औसत दर्ज़े की ये कविता ।
है उम्मीद इतनी सी
कल कोई न कोई ज़रूर होगा इसका चहेता ॥