Tuesday, August 23, 2011

क्यूँ पैसे इतना उड़ाते हैं हम ?


क्यूँ पैसे इतना उड़ाते हैं हम ?
क्यूँ बेफजूल इतना लुटाते हैं हम ?

KFC McD की है लग गयी हमें लत,
न जाने कितनो को नसीब नहीं है इक छत ।
सिनेमा हर सप्ताह-अंत हैं हम जाते,
घर कईयों के अन्न नहीं हैं आते ।

चार जूतों से चलता नहीं काम,
पांचवां हमें हैं चाहिए होता ।
कहीं कोई मजबूर मजदूर अभागा,
नंगे पावं है बैठे रोता ।

स्वावलंबी कोई रहा नहीं अब,
सब कुछ करे नौकर कोई ।
तनिक ज़रा इक पलछिन सोंचो,
कितनी रातें माता अपनी नहीं थी सोयी ।
लगे हुए सब कमाने और उड़ाने में,
भूल गए जड़ें अपनी ।

घर पर बैठी अकेली माता मेरी ,
पिता जी की राह देखती ,
मन में अपने यादों की बारात लिए,
ख़ुशी ख़ुशी था किया टेलीफ़ोन हमको,
मैं निर्मम झट फ़ोन काट कर,
लग जाता हूँ कमाने को , उड़ाने को ।

एक रूपये का मोल था कभी,
कम पड़ जाते हैं हज़ार अभी ।
ज़रा ह्रदय से खुद की पूछो,
अपने अंतर-मन को टटोलो ।
क्यूँ पैसे इतना उड़ाते हैं हम ?
क्यूँ बेफजूल इतना लुटाते हैं हम ?

-अमरकांत सिंह

11 comments:

  1. i still remember jeb humko 50 paise per day pocket money milti thi.. Aur jeb 50 paise se badh ke 1rs hui to kitne khush hue the hum!!!

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  2. @Neha Mujhe kabhi pocket money nahin milti thi, haan kabhi kabhar ek do rupye mil jaate the!

    @Ranjan thankuuu :) Bole the na likhenge :P

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. Replies
    1. hey Richa, is your blog down? or if up, can you forward me a link, my Papaji wanted it, as he had loved your poems.

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